11 Oct 2026, 02:57 PM
12वीं तक पढ़ाई पूरी करना लड़कियों के लिए अब भी चुनौती, रिपोर्ट में खुलासा
ABP News
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<p style="text-align: justify;">भारत में पिछले 25 वर्षों में स्कूली शिक्षा में लड़के और लड़कियों के बीच अंतर कम करने में काफी प्रगति की है. इसके बावजूद ग्रामीण इलाकों में लड़कियों के लिए 12वीं तक की पढ़ाई पूरी करना अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है. यूनेस्को की नई रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण भारत में जहां 100 लड़के उच्च माध्यमिक शिक्षा (कक्षा 11 और 12वीं) की पढ़ाई पूरी करते हैं, वहीं ऐसा करने वाली लड़कियों की संख्या केवल 59 है. इसके उलट शहरी क्षेत्रों में लड़के और लड़कियां इस स्तर की शिक्षा को पूरी करने के मामले में बराबरी पर पहुंच चुके हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">जेंडर इक्वैलिटी इन एक्सेस टू एजुकेशन रिपोर्ट में 31 निम्न और मध्यम आय वाले देश में शिक्षा के क्षेत्र में लैंगिक असमानता का अध्ययन किया गया है. रिपोर्ट बताती है कि भारत ने लंबे समय में लड़कियों की शिक्षा से जुड़ी शुरुआती कमियों को काफी हद तक काम किया है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर हुई प्रगति का फायदा सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंचा है. खासकर ग्रामीण क्षेत्रों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की लड़कियों को पढ़ाई जारी रखने में ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है..</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>गांव में गर्ल एजुकेशन अब भी चुनौती</strong></p>
<p style="text-align: justify;">यूनेस्को की रिपोर्ट में उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के लिए भारत का समायोजित जेंडर पैरिटी इंडेक्स कुल मिलाकर 0.89 दर्ज किया गया है. ग्रामीण क्षेत्र में यह आंकड़ा 0.59 और शहरी क्षेत्र में 1.0 है. इस इंडेक्स को आसान भाषा में समझे तो 1 का मतलब लड़के और लड़कियों के बीच बराबरी है. भारत में कुल आंकड़ा 0.89 होने का अर्थ है कि 100 लड़कों को उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने पर करीब 89 लड़कियां भी इस स्तर तक पहुंच रही है. ग्रामीण इलाकों में यह संख्या घटकर 59 रह जाती है, जबकि शहरों में दोनों के बीच बराबरी दर्ज की गई है. रिपोर्ट के अनुसार केवल देश का औसत देखकर यह नहीं समझा जा सकता कि शिक्षा के क्षेत्र में सभी लड़कियों की स्थिति समान है. शहरी क्षेत्र में बेहतर स्थिति के बावजूद ग्रामीण लड़कियों को 12वीं तक पढ़ाई पूरी करने में कई तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ता है.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>स्कूली शिक्षा में भारत ने 25 वर्षों में की खूब तरक्की</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारत की स्कूली शिक्षा में पिछले ढाई दशकों के दौरान हुए बदलावों को भी रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है. वर्ष 2000 में भारत उन 47 देशों में शामिल था, जहां लड़कों की तुलना में लड़कियों के पढ़ाई छोड़ने की समस्या ज्यादा गंभीर थी. रिपोर्ट के अनुसार भारत ने पिछले 25 सालों में इस शुरुआती अंतर को करीब 65% तक कम किया है. यह प्रगति दिखाती है कि लड़कियों की शिक्षा तक पहुंच बेहतर बनाने की दिशा में लगातार प्रयास हुए हैं. हालांकि ग्रामीण और शहरी क्षेत्र के बीच बना अंतर बताता है कि अभी भी कई स्तरों पर काम करने की जरूरत है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ये भी पढ़ें-<a href="https://www.abplive.com/education/upsc-nda-2-result-released-candidates-must-complete-ssb-registration-within-two-weeks-3200065">UPSC NDA 2 का रिजल्ट जारी, 2 हफ्ते के अंदर पूरा करें SSB रजिस्ट्रेशन</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>लड़कियों के स्कूल छोड़ने की चुनौती&nbsp;</strong></p>
<p style="text-align: justify;">ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी उम्र की लड़कियों को शिक्षा से जोड़े रखना अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है. एएसईआर 2024 की रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण भारत में 15 से 16 साल की 8.1% लड़कियां स्कूल में रजिस्टर्ड नहीं थी. वर्ष 2022 में यह आंकड़ा 7.9% था. यह आंकड़े 12वीं की पढ़ाई पूरी करने वाली लड़कियों की संख्या नहीं, बल्कि स्कूल में नामांकन की स्थिति बताते हैं. फिर भी इसे संकेत मिलता है कि किशोरावस्था में पहुंचने के बाद लड़कियों की शिक्षा जारी रखने में मुश्किलें बनी हुई है. यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा में लड़कियों को नुकसान का सामना करने वाले देशों में सबसे गरीब परिवारों के लिए जेंडर पैरिटी इंडेक्स का औसत 0.6 था. वहीं सबसे अमीर 20% परिवारों में यह आंकड़ा 0.92 रहा. &nbsp;इससे पता चलता है कि आर्थिक स्थिति भी लड़कियों और लड़कों की शिक्षा के बीच अंतर को बढ़ा सकती है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>5 साल के 51% बच्चे सीधे पहली कक्षा में ले रहे एडमिशन&nbsp;</strong></p>
<p style="text-align: justify;">यूनेस्को की ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग रिपोर्ट 2026 में भारत में छोटे बच्चों की स्कूली शिक्षा से जुड़ा एक और अहम मुद्दा सामने आया है. रिपोर्ट के अनुसार भारत में 5 साल की उम्र के 51% बच्चे प्री-स्कूल यानी आंगनवाड़ी, नर्सरी या केजी में जाने के बजाय सीधे कक्षा 1 में एडमिशन ले रहे हैं. रिपोर्ट के अनुसार बच्चे अनुशंसित उम्र से पहले ही औपचारिक स्कूली शिक्षा में प्रवेश कर रहे हैं. भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में कक्षा 1 में एडमिशन के लिए न्यूनतम उम्र 6 साल निर्धारित की गई है. रिपोर्ट में बताया गया है कि कुछ राज्यों में 5 साल में बच्चों का प्री-प्राइमरी संस्थानों में नामांकन 90% से ज्यादा है. वहीं कर्नाटक के ग्रामीण क्षेत्रों में छात्रवृत्ति मॉडल की सराहना की गई है. गुजरात, महाराष्ट्र, केरल और नागालैंड में भी इस मामले में बेहतर स्थिति का जिक्र किया गया है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ये भी पढ़ें-<a href="https://www.abplive.com/education/rpsc-senior-teacher-exam-880-candidates-disqualified-and-1217-shortlisted-for-verification-3200092#google_vignette">RPSC वरिष्ठ अध्यापक परीक्षा 2025 में 880 अभ्यर्थी अयोग्य, 1217 की होगी जांच</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;">जेंडर इक्वैलिटी इन एक्सेस टू एजुकेशन रिपोर्ट में 31 निम्न और मध्यम आय वाले देश में शिक्षा के क्षेत्र में लैंगिक असमानता का अध्ययन किया गया है. रिपोर्ट बताती है कि भारत ने लंबे समय में लड़कियों की शिक्षा से जुड़ी शुरुआती कमियों को काफी हद तक काम किया है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर हुई प्रगति का फायदा सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंचा है. खासकर ग्रामीण क्षेत्रों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की लड़कियों को पढ़ाई जारी रखने में ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है..</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>गांव में गर्ल एजुकेशन अब भी चुनौती</strong></p>
<p style="text-align: justify;">यूनेस्को की रिपोर्ट में उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के लिए भारत का समायोजित जेंडर पैरिटी इंडेक्स कुल मिलाकर 0.89 दर्ज किया गया है. ग्रामीण क्षेत्र में यह आंकड़ा 0.59 और शहरी क्षेत्र में 1.0 है. इस इंडेक्स को आसान भाषा में समझे तो 1 का मतलब लड़के और लड़कियों के बीच बराबरी है. भारत में कुल आंकड़ा 0.89 होने का अर्थ है कि 100 लड़कों को उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने पर करीब 89 लड़कियां भी इस स्तर तक पहुंच रही है. ग्रामीण इलाकों में यह संख्या घटकर 59 रह जाती है, जबकि शहरों में दोनों के बीच बराबरी दर्ज की गई है. रिपोर्ट के अनुसार केवल देश का औसत देखकर यह नहीं समझा जा सकता कि शिक्षा के क्षेत्र में सभी लड़कियों की स्थिति समान है. शहरी क्षेत्र में बेहतर स्थिति के बावजूद ग्रामीण लड़कियों को 12वीं तक पढ़ाई पूरी करने में कई तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ता है.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>स्कूली शिक्षा में भारत ने 25 वर्षों में की खूब तरक्की</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारत की स्कूली शिक्षा में पिछले ढाई दशकों के दौरान हुए बदलावों को भी रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है. वर्ष 2000 में भारत उन 47 देशों में शामिल था, जहां लड़कों की तुलना में लड़कियों के पढ़ाई छोड़ने की समस्या ज्यादा गंभीर थी. रिपोर्ट के अनुसार भारत ने पिछले 25 सालों में इस शुरुआती अंतर को करीब 65% तक कम किया है. यह प्रगति दिखाती है कि लड़कियों की शिक्षा तक पहुंच बेहतर बनाने की दिशा में लगातार प्रयास हुए हैं. हालांकि ग्रामीण और शहरी क्षेत्र के बीच बना अंतर बताता है कि अभी भी कई स्तरों पर काम करने की जरूरत है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ये भी पढ़ें-<a href="https://www.abplive.com/education/upsc-nda-2-result-released-candidates-must-complete-ssb-registration-within-two-weeks-3200065">UPSC NDA 2 का रिजल्ट जारी, 2 हफ्ते के अंदर पूरा करें SSB रजिस्ट्रेशन</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>लड़कियों के स्कूल छोड़ने की चुनौती&nbsp;</strong></p>
<p style="text-align: justify;">ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी उम्र की लड़कियों को शिक्षा से जोड़े रखना अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है. एएसईआर 2024 की रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण भारत में 15 से 16 साल की 8.1% लड़कियां स्कूल में रजिस्टर्ड नहीं थी. वर्ष 2022 में यह आंकड़ा 7.9% था. यह आंकड़े 12वीं की पढ़ाई पूरी करने वाली लड़कियों की संख्या नहीं, बल्कि स्कूल में नामांकन की स्थिति बताते हैं. फिर भी इसे संकेत मिलता है कि किशोरावस्था में पहुंचने के बाद लड़कियों की शिक्षा जारी रखने में मुश्किलें बनी हुई है. यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा में लड़कियों को नुकसान का सामना करने वाले देशों में सबसे गरीब परिवारों के लिए जेंडर पैरिटी इंडेक्स का औसत 0.6 था. वहीं सबसे अमीर 20% परिवारों में यह आंकड़ा 0.92 रहा. &nbsp;इससे पता चलता है कि आर्थिक स्थिति भी लड़कियों और लड़कों की शिक्षा के बीच अंतर को बढ़ा सकती है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>5 साल के 51% बच्चे सीधे पहली कक्षा में ले रहे एडमिशन&nbsp;</strong></p>
<p style="text-align: justify;">यूनेस्को की ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग रिपोर्ट 2026 में भारत में छोटे बच्चों की स्कूली शिक्षा से जुड़ा एक और अहम मुद्दा सामने आया है. रिपोर्ट के अनुसार भारत में 5 साल की उम्र के 51% बच्चे प्री-स्कूल यानी आंगनवाड़ी, नर्सरी या केजी में जाने के बजाय सीधे कक्षा 1 में एडमिशन ले रहे हैं. रिपोर्ट के अनुसार बच्चे अनुशंसित उम्र से पहले ही औपचारिक स्कूली शिक्षा में प्रवेश कर रहे हैं. भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में कक्षा 1 में एडमिशन के लिए न्यूनतम उम्र 6 साल निर्धारित की गई है. रिपोर्ट में बताया गया है कि कुछ राज्यों में 5 साल में बच्चों का प्री-प्राइमरी संस्थानों में नामांकन 90% से ज्यादा है. वहीं कर्नाटक के ग्रामीण क्षेत्रों में छात्रवृत्ति मॉडल की सराहना की गई है. गुजरात, महाराष्ट्र, केरल और नागालैंड में भी इस मामले में बेहतर स्थिति का जिक्र किया गया है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ये भी पढ़ें-<a href="https://www.abplive.com/education/rpsc-senior-teacher-exam-880-candidates-disqualified-and-1217-shortlisted-for-verification-3200092#google_vignette">RPSC वरिष्ठ अध्यापक परीक्षा 2025 में 880 अभ्यर्थी अयोग्य, 1217 की होगी जांच</a></strong></p>
Source Credit: abplive.com
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