01 Nov 2026, 09:18 PM
Smart Watch Sensor: बिना खून निकाले हार्ट रेट कैसे नाप लेती है स्मार्टवॉच, समझिए टेक्नोलॉजी
ABP News
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<p style="text-align: justify;">आज के समय में स्मार्टवॉच केवल समय देखने या मोबाइल नोटिफिकेशन पढ़ने तक सीमित नहीं रह गई हैं. अब इनकी मदद से लोग अपनी सेहत से जुड़ी कई जानकारियों का भी पता लगा लेते हैं. इनमें हार्ट रेट यानी दिल की धड़कन मापने का फीचर सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है. हैरानी की बात यह है कि इसके लिए न तो खून निकालने की जरूरत पड़ती है और न ही शरीर में कोई सुई लगाई जाती है. बस घड़ी को कलाई पर पहनना होता है और कुछ ही सेकंड में स्क्रीन पर हार्ट रेट दिखाई देने लगता है. ऐसे में कई लोगों के मन में सवाल उठता है कि आखिर स्मार्टवॉच बिना खून निकाले दिल की धड़कन कैसे गिन लेती है?</p>
<p style="text-align: justify;">दरअसल इसके पीछे एक खास ऑप्टिकल तकनीक काम करती है, जिसे फोटोप्लेथिस्मोग्राफी यानी PPG (Photoplethysmography) कहा जाता है. यह तकनीक शरीर में खून के प्रवाह के कारण होने वाले छोटे-छोटे बदलावों को पहचानती है. स्मार्टवॉच में लगे सेंसर त्वचा पर रोशनी डालते हैं और उससे मिलने वाले संकेतों का एनालिसिस करके हार्ट रेट का अनुमान लगाते हैं. आइए समझते हैं कि यह पूरी प्रोसेस कैसे काम करती है.</p>
<h3 style="text-align: justify;">LED सेंसर करते हैं मदद</h3>
<p style="text-align: justify;">अगर आपने कभी स्मार्टवॉच को कलाई से उतारकर पीछे की तरफ देखा होगा, तो वहां आपको कुछ छोटे सेंसर और हरी रोशनी दिखाई दी होगी. यही रोशनी हार्ट रेट मापने की प्रोसेसे का अहम हिस्सा होती है. स्मार्टवॉच में लगे LED सेंसर त्वचा के अंदर हरी रोशनी भेजते हैं. इसके बाद एक फोटो डायोड सेंसर यह पता लगाता है कि त्वचा से कितनी रोशनी वापस आ रही है. जब दिल धड़कता है, तो आर्टरीज में खून का प्रवाह बढ़ता है. इससे कलाई की बल्ड वेसल्स में खून की मात्रा में थोड़ा बदलाव होता है. खून हरी रोशनी को आसपास के टिश्यू की तुलना में ज्यादा अवशोषित करता है. इसलिए जब धड़कन के साथ खून की मात्रा बढ़ती है, तो सेंसर तक वापस पहुंचने वाली रोशनी कम हो जाती है.</p>
<h3 style="text-align: justify;">सेंसर गिनता है दिल की धड़कन</h3>
<p style="text-align: justify;">स्मार्टवॉच का सेंसर लगातार रोशनी में होने वाले इन छोटे बदलावों को रिकॉर्ड करता रहता है. इसके बाद घड़ी का सॉफ्टवेयर इन संकेतों का एनालिसिस करता है. हर धड़कन के साथ मिलने वाले संकेतों के पैटर्न को पहचानकर यह पता लगाया जाता है कि एक मिनट में दिल कितनी बार धड़क रहा है. इसी गणना को बीपीएम यानी Beats Per Minute कहा जाता है. अगर स्मार्टवॉच स्क्रीन पर 75 BPM दिखा रही है, तो इसका मतलब है कि आपका दिल एक मिनट में लगभग 75 बार धड़क रहा है. हालांकि स्मार्टवॉच केवल रोशनी के आधार पर ही गणना नहीं करती. इसमें खास एल्गोरिदम भी होते हैं, जो बाहरी हलचल और दूसरे कारणों से पैदा होने वाले गलत संकेतों को कम करने की कोशिश करते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>यह भी पढ़ें: </strong><a href="https://www.abplive.com/photo-gallery/technology/temple-how-different-it-is-from-smartwatches-and-fitness-bands-how-does-it-work-know-the-details-3209282"><strong>स्मार्टवॉच और फिटनेस बैंड से कितना अलग है Temple, कैसे करता है काम?</strong></a></p>
<h3 style="text-align: justify;">&nbsp;हर बार सही हार्ट रेट नहीं बताती स्मार्टवॉच</h3>
<p style="text-align: justify;">स्मार्टवॉच से मिलने वाला हार्ट रेट रीडिंग आमतौर पर रोजमर्रा की गतिविधियों और आराम के समय उपयोगी हो सकता है. हालांकि इसकी सटीकता कई बातों पर निर्भर करती है. अगर घड़ी कलाई पर ढीली पहनी गई है, तो सेंसर को सही संकेत नहीं मिल सकते. इसके अलावा दौड़ने, व्यायाम करने या हाथ तेजी से हिलाने पर भी रीडिंग प्रभावित हो सकती है. त्वचा का रंग, कलाई पर टैटू, शरीर का तापमान और सेंसर की गुणवत्ता भी कुछ डिवाइस में रीडिंग को प्रभावित करती है. इसलिए अलग-अलग स्मार्टवॉच में हार्ट रेट के आंकड़ों में थोड़ा अंतर देखने को मिलता है.</p>
<h3 style="text-align: justify;">हार्ट रेट सेंसर और ECG में होता है अंतर</h3>
<p style="text-align: justify;">कई लोग PPG सेंसर और ECG फीचर को एक ही समझ लेते हैं, जबकि दोनों की तकनीक अलग है. PPG सेंसर रोशनी के जरिए खून के प्रवाह में होने वाले बदलावों को मापता है. वहीं ECG यानी इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम दिल की विद्युत गतिविधियों को रिकॉर्ड करता है. कुछ स्मार्टवॉच में ECG की सुविधा भी मिलती है, लेकिन इसके लिए आमतौर पर घड़ी के साथ दूसरे इलेक्ट्रोड को उंगली से छूना पड़ता है. यह फीचर सामान्य हार्ट रेट मॉनिटर से अलग है और सभी स्मार्टवॉच में उपलब्ध नहीं होता.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>यह भी पढ़ें: </strong><a href="https://www.abplive.com/technology/diwali-lights-change-the-color-control-the-lights-with-your-phone-while-sitting-3209126"><strong>Diwali Smart Lights: मोबाइल से बदलें दिवाली की झालर का रंग, बिना उठे कंट्रोल होंगी लाइट्स</strong></a></p>
<p style="text-align: justify;">दरअसल इसके पीछे एक खास ऑप्टिकल तकनीक काम करती है, जिसे फोटोप्लेथिस्मोग्राफी यानी PPG (Photoplethysmography) कहा जाता है. यह तकनीक शरीर में खून के प्रवाह के कारण होने वाले छोटे-छोटे बदलावों को पहचानती है. स्मार्टवॉच में लगे सेंसर त्वचा पर रोशनी डालते हैं और उससे मिलने वाले संकेतों का एनालिसिस करके हार्ट रेट का अनुमान लगाते हैं. आइए समझते हैं कि यह पूरी प्रोसेस कैसे काम करती है.</p>
<h3 style="text-align: justify;">LED सेंसर करते हैं मदद</h3>
<p style="text-align: justify;">अगर आपने कभी स्मार्टवॉच को कलाई से उतारकर पीछे की तरफ देखा होगा, तो वहां आपको कुछ छोटे सेंसर और हरी रोशनी दिखाई दी होगी. यही रोशनी हार्ट रेट मापने की प्रोसेसे का अहम हिस्सा होती है. स्मार्टवॉच में लगे LED सेंसर त्वचा के अंदर हरी रोशनी भेजते हैं. इसके बाद एक फोटो डायोड सेंसर यह पता लगाता है कि त्वचा से कितनी रोशनी वापस आ रही है. जब दिल धड़कता है, तो आर्टरीज में खून का प्रवाह बढ़ता है. इससे कलाई की बल्ड वेसल्स में खून की मात्रा में थोड़ा बदलाव होता है. खून हरी रोशनी को आसपास के टिश्यू की तुलना में ज्यादा अवशोषित करता है. इसलिए जब धड़कन के साथ खून की मात्रा बढ़ती है, तो सेंसर तक वापस पहुंचने वाली रोशनी कम हो जाती है.</p>
<h3 style="text-align: justify;">सेंसर गिनता है दिल की धड़कन</h3>
<p style="text-align: justify;">स्मार्टवॉच का सेंसर लगातार रोशनी में होने वाले इन छोटे बदलावों को रिकॉर्ड करता रहता है. इसके बाद घड़ी का सॉफ्टवेयर इन संकेतों का एनालिसिस करता है. हर धड़कन के साथ मिलने वाले संकेतों के पैटर्न को पहचानकर यह पता लगाया जाता है कि एक मिनट में दिल कितनी बार धड़क रहा है. इसी गणना को बीपीएम यानी Beats Per Minute कहा जाता है. अगर स्मार्टवॉच स्क्रीन पर 75 BPM दिखा रही है, तो इसका मतलब है कि आपका दिल एक मिनट में लगभग 75 बार धड़क रहा है. हालांकि स्मार्टवॉच केवल रोशनी के आधार पर ही गणना नहीं करती. इसमें खास एल्गोरिदम भी होते हैं, जो बाहरी हलचल और दूसरे कारणों से पैदा होने वाले गलत संकेतों को कम करने की कोशिश करते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>यह भी पढ़ें: </strong><a href="https://www.abplive.com/photo-gallery/technology/temple-how-different-it-is-from-smartwatches-and-fitness-bands-how-does-it-work-know-the-details-3209282"><strong>स्मार्टवॉच और फिटनेस बैंड से कितना अलग है Temple, कैसे करता है काम?</strong></a></p>
<h3 style="text-align: justify;">&nbsp;हर बार सही हार्ट रेट नहीं बताती स्मार्टवॉच</h3>
<p style="text-align: justify;">स्मार्टवॉच से मिलने वाला हार्ट रेट रीडिंग आमतौर पर रोजमर्रा की गतिविधियों और आराम के समय उपयोगी हो सकता है. हालांकि इसकी सटीकता कई बातों पर निर्भर करती है. अगर घड़ी कलाई पर ढीली पहनी गई है, तो सेंसर को सही संकेत नहीं मिल सकते. इसके अलावा दौड़ने, व्यायाम करने या हाथ तेजी से हिलाने पर भी रीडिंग प्रभावित हो सकती है. त्वचा का रंग, कलाई पर टैटू, शरीर का तापमान और सेंसर की गुणवत्ता भी कुछ डिवाइस में रीडिंग को प्रभावित करती है. इसलिए अलग-अलग स्मार्टवॉच में हार्ट रेट के आंकड़ों में थोड़ा अंतर देखने को मिलता है.</p>
<h3 style="text-align: justify;">हार्ट रेट सेंसर और ECG में होता है अंतर</h3>
<p style="text-align: justify;">कई लोग PPG सेंसर और ECG फीचर को एक ही समझ लेते हैं, जबकि दोनों की तकनीक अलग है. PPG सेंसर रोशनी के जरिए खून के प्रवाह में होने वाले बदलावों को मापता है. वहीं ECG यानी इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम दिल की विद्युत गतिविधियों को रिकॉर्ड करता है. कुछ स्मार्टवॉच में ECG की सुविधा भी मिलती है, लेकिन इसके लिए आमतौर पर घड़ी के साथ दूसरे इलेक्ट्रोड को उंगली से छूना पड़ता है. यह फीचर सामान्य हार्ट रेट मॉनिटर से अलग है और सभी स्मार्टवॉच में उपलब्ध नहीं होता.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>यह भी पढ़ें: </strong><a href="https://www.abplive.com/technology/diwali-lights-change-the-color-control-the-lights-with-your-phone-while-sitting-3209126"><strong>Diwali Smart Lights: मोबाइल से बदलें दिवाली की झालर का रंग, बिना उठे कंट्रोल होंगी लाइट्स</strong></a></p>
Source Credit: abplive.com
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