03 Nov 2026, 09:58 PM
Explained: हिमालय के सब नहीं, तो किन शहरों को बचाया जा सकता है? जानें कहां फंसी बात
ABP News
@abpnews
<p style="text-align: justify;">हिमालय के शहरों को बचाने का सवाल अब सिर्फ पर्यावरणविदों की चिंता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन का सबसे बड़ा इम्तिहान बन चुका है. इसरो के 'लैंडस्लाइड एटलस ऑफ इंडिया' के मुताबिक, 1998 से 2022 के बीच हिमालय और पश्चिमी घाट में करीब 80,000 भूस्खलन दर्ज किए गए, जिनमें से 66.5% अकेले उत्तर-पश्चिमी हिमालय में हुए. जोशीमठ जैसे शहरों में 2023 में आई दरारों ने 678 इमारतों को असुरक्षित करार दिया, लेकिन तीन साल बाद भी विस्थापन अधूरा है.</p>
<p style="text-align: justify;"><em><strong>सवाल यह है कि हिमालय की गोद में किन शहरों को बचाया जा सकता है, किन्हें नहीं और इसके लिए कौन सी ठोस योजनाएं मौजूद हैं?</strong></em></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>हिमालयी शहरों के सामने असली खतरा क्या है?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">हिमालयी शहरों को तीन तरह के खतरे एक साथ घेरते हैं:</p>
<ul>
<li style="text-align: justify;"><strong>भूस्खलन और भू-धंसाव:</strong> जोशीमठ प्राचीन भूस्खलन मलबे पर बसा है और सीस्मिक जोन-V में आता है, जहां सैटेलाइट डेटा बताता है कि शहर के कुछ हिस्से सालाना 94 मिमी तक धंस रहे हैं.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF):</strong> इसरो के मुताबिक, 1984 से 2023 के बीच 2,431 में से 676 ग्लेशियल झीलें बढ़ी हैं, जिससे नए बाढ़ खतरे पैदा हो रहे हैं.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>अनप्लान्ड शहरीकरण और पर्यटन का दबाव:</strong> नैनीताल और शिमला जैसे शहरों में जल, सफाई और पर्यटन ढांचा अपनी सीमा तक पहुंच चुका है. यही वजह है कि सवाल 'क्या बचा जा सकता है' से आगे बढ़कर 'क्या बचाना चाहिए' तक पहुंच गया है.</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;"><strong>प्लानिंग, मौजूदा योजनाएं और नियम क्या है?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">सरकार और न्यायपालिका ने हिमालयी शहरों को बचाने के लिए कई स्तरों पर काम शुरू किया है:</p>
<ul>
<li style="text-align: justify;"><strong>NDMA के सख्त नियम:</strong> राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने सुझाव दिया है कि भूस्खलन क्षेत्रों के 250 मीटर के दायरे में और भूकंपीय फॉल्ट लाइनों के दोनों ओर 50 मीटर तक कोई निर्माण नहीं होना चाहिए. पहाड़ी इलाकों में इमारत की मैक्सिमम ऊंचाई 7.5 मीटर होनी चाहिए और फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) 1.7 से ज्यादा नहीं होना चाहिए.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>सुप्रीम कोर्ट की वहन क्षमता समिति:</strong> सुप्रीम कोर्ट के केंद्रीय अधिकृत समिति (CEC) ने अक्टूबर 2026 में हिमाचल प्रदेश के लिए कई सिफारिशें दी हैं. प्रमुख पर्यटन स्थलों की वैज्ञानिक वहन क्षमता का आकलन, पहाड़ी सड़कों के निर्माण के लिए अनिवार्य पर्यावरणीय मंजूरी और पर्यटन-संबंधी निर्माणों के लिए 'अनुमति-आधारित' नजरिए से 'वैज्ञानिक और जोखिम-संवेदनशील योजना' की ओर बदलाव.</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;">'स्वच्छ हिमालयी पर्वतीय शहरों' के लिए रूपरेखा तैयार की जा रही है, जिसे 2026 की शुरुआत में लागू करने का प्रस्ताव है. 'हिमालयन अर्बन बायो-शेड्स (HUBS)' परियोजना के तहत शहरों को पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में देखकर जल और कचरा प्रबंधन को बदलने की कोशिश हो रही है.</p>
<p style="text-align: justify;">इसके अलावा, शिमला में हर वार्ड के लिए आपदा योजना बनाई जा रही है. धर्मशाला और मंडी के बाद शिमला का भी आपदा प्लान तैयार किया जा रहा है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>जमीन पर क्या हो रहा है?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">योजनाओं के बावजूद जमीनी हकीकत बहुत अच्छी नहीं है. जोशीमठ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. केंद्र सरकार ने नवंबर 2023 में 1,658.17 करोड़ रुपए के पुनर्वास और पुनर्निर्माण पैकेज को मंजूरी दी थी. इसमें 91.82 करोड़ रुपए भूमि अधिग्रहण के लिए थे.</p>
<p style="text-align: justify;">मई 2025 में सरकार ने भू-धंसाव रोकने के लिए 291 करोड़ रुपए मंजूर किए, जिसमें अलकनंदा नदी के किनारे 'टो प्रोटेक्शन', ढलान स्थिरीकरण और जल निकासी व्यवस्था का अपग्रेडेशन शामिल था. 2026 की रिपोर्टें बताती हैं कि तीन साल बाद भी विस्थापन अधूरा है. वैज्ञानिकों का कहना है कि भू-धंसाव पूरी तरह रुका नहीं है और मानसून में हालात फिर बिगड़ सकते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सबसे बड़ी अड़चन क्या है?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">हिमालयी इलाकों के शहरों को बचाने में 3 बड़ी अड़चनें हैं:</p>
<ul>
<li style="text-align: justify;"><strong>राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी:</strong> पर्यावरण कार्यकर्ता मंशी असर का कहना है कि समस्या तकनीक या नियमों की कमी नहीं है, बल्कि राजनीतिक चुनाव है कि संरक्षण तंत्र को नजरअंदाज किया जाए.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>पुनर्वास में मुश्किलें:</strong> नेपाल के 2015 <a title="भूकंप" href="https://www.abplive.com/topic/earthquake" data-type="interlinkingkeywords">भूकंप</a> के बाद पता चलता है कि लोग नए स्थानों पर बसने के बजाय अपने पुराने गांवों और खेतों के बीच आना-जाना करते रहते हैं. इसे सर्कुलर रीसेटलमेंट कहा जाता है. जोशीमठ में भी कई लोग पुनर्वास स्थलों से सहमत नहीं हैं.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>वहन क्षमता का कैलकुलेशन:</strong> सुप्रीम कोर्ट की समिति ने सुझाव दिया है कि पर्यटन स्थलों की वहन क्षमता का आकलन किया जाए, लेकिन यह भी चेतावनी दी गई है कि यह ऊपर से थोपे गए प्रतिबंध न बन जाएं, बल्कि स्थानीय लोगों की भागीदारी से तय हों.</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;"><strong>तो क्या सभी शहरों को नहीं बचाया जा सकता?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">इस पूरी बहस का सार यह है कि हिमालय के सभी शहरों को उसी रूप में बचाया नहीं जा सकता. कुछ जगहों पर भूगोल ही ऐसा है कि बार-बार पुनर्निर्माण के बाद भी जोखिम बना रहता है. इसका मतलब यह नहीं कि सब कुछ खत्म हो गया है. कई शहरों का भविष्य होगा, लेकिन उनका भविष्य हर चीज को वैसे ही दोबारा बनाने पर निर्भर नहीं हो सकता.</p>
<p style="text-align: justify;">असली काम यह तय करना है कि क्या सुरक्षित बनाया जा सकता है, क्या बहाल किया जा सकता है और क्या बदलना ही होगा. जोशीमठ में भू-धंसाव रोकने के लिए ढलान स्थिरीकरण और जल निकासी पर काम शुरू हो चुका है.</p>
<p style="text-align: justify;">सुप्रीम कोर्ट की समिति पर्यटन स्थलों की वहन क्षमता तय करने पर जोर दे रही है. जब तक राजनीतिक इच्छाशक्ति, स्थानीय भागीदारी और वैज्ञानिक आकलन एक साथ नहीं आते, तब तक हिमालयी शहरों की कहानी 'बचाव' से ज्यादा 'इंतजार' की बनी रहेगी.</p>
<p style="text-align: justify;"><em><strong>सवाल यह है कि हिमालय की गोद में किन शहरों को बचाया जा सकता है, किन्हें नहीं और इसके लिए कौन सी ठोस योजनाएं मौजूद हैं?</strong></em></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>हिमालयी शहरों के सामने असली खतरा क्या है?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">हिमालयी शहरों को तीन तरह के खतरे एक साथ घेरते हैं:</p>
<ul>
<li style="text-align: justify;"><strong>भूस्खलन और भू-धंसाव:</strong> जोशीमठ प्राचीन भूस्खलन मलबे पर बसा है और सीस्मिक जोन-V में आता है, जहां सैटेलाइट डेटा बताता है कि शहर के कुछ हिस्से सालाना 94 मिमी तक धंस रहे हैं.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF):</strong> इसरो के मुताबिक, 1984 से 2023 के बीच 2,431 में से 676 ग्लेशियल झीलें बढ़ी हैं, जिससे नए बाढ़ खतरे पैदा हो रहे हैं.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>अनप्लान्ड शहरीकरण और पर्यटन का दबाव:</strong> नैनीताल और शिमला जैसे शहरों में जल, सफाई और पर्यटन ढांचा अपनी सीमा तक पहुंच चुका है. यही वजह है कि सवाल 'क्या बचा जा सकता है' से आगे बढ़कर 'क्या बचाना चाहिए' तक पहुंच गया है.</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;"><strong>प्लानिंग, मौजूदा योजनाएं और नियम क्या है?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">सरकार और न्यायपालिका ने हिमालयी शहरों को बचाने के लिए कई स्तरों पर काम शुरू किया है:</p>
<ul>
<li style="text-align: justify;"><strong>NDMA के सख्त नियम:</strong> राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने सुझाव दिया है कि भूस्खलन क्षेत्रों के 250 मीटर के दायरे में और भूकंपीय फॉल्ट लाइनों के दोनों ओर 50 मीटर तक कोई निर्माण नहीं होना चाहिए. पहाड़ी इलाकों में इमारत की मैक्सिमम ऊंचाई 7.5 मीटर होनी चाहिए और फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) 1.7 से ज्यादा नहीं होना चाहिए.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>सुप्रीम कोर्ट की वहन क्षमता समिति:</strong> सुप्रीम कोर्ट के केंद्रीय अधिकृत समिति (CEC) ने अक्टूबर 2026 में हिमाचल प्रदेश के लिए कई सिफारिशें दी हैं. प्रमुख पर्यटन स्थलों की वैज्ञानिक वहन क्षमता का आकलन, पहाड़ी सड़कों के निर्माण के लिए अनिवार्य पर्यावरणीय मंजूरी और पर्यटन-संबंधी निर्माणों के लिए 'अनुमति-आधारित' नजरिए से 'वैज्ञानिक और जोखिम-संवेदनशील योजना' की ओर बदलाव.</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;">'स्वच्छ हिमालयी पर्वतीय शहरों' के लिए रूपरेखा तैयार की जा रही है, जिसे 2026 की शुरुआत में लागू करने का प्रस्ताव है. 'हिमालयन अर्बन बायो-शेड्स (HUBS)' परियोजना के तहत शहरों को पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में देखकर जल और कचरा प्रबंधन को बदलने की कोशिश हो रही है.</p>
<p style="text-align: justify;">इसके अलावा, शिमला में हर वार्ड के लिए आपदा योजना बनाई जा रही है. धर्मशाला और मंडी के बाद शिमला का भी आपदा प्लान तैयार किया जा रहा है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>जमीन पर क्या हो रहा है?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">योजनाओं के बावजूद जमीनी हकीकत बहुत अच्छी नहीं है. जोशीमठ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. केंद्र सरकार ने नवंबर 2023 में 1,658.17 करोड़ रुपए के पुनर्वास और पुनर्निर्माण पैकेज को मंजूरी दी थी. इसमें 91.82 करोड़ रुपए भूमि अधिग्रहण के लिए थे.</p>
<p style="text-align: justify;">मई 2025 में सरकार ने भू-धंसाव रोकने के लिए 291 करोड़ रुपए मंजूर किए, जिसमें अलकनंदा नदी के किनारे 'टो प्रोटेक्शन', ढलान स्थिरीकरण और जल निकासी व्यवस्था का अपग्रेडेशन शामिल था. 2026 की रिपोर्टें बताती हैं कि तीन साल बाद भी विस्थापन अधूरा है. वैज्ञानिकों का कहना है कि भू-धंसाव पूरी तरह रुका नहीं है और मानसून में हालात फिर बिगड़ सकते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सबसे बड़ी अड़चन क्या है?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">हिमालयी इलाकों के शहरों को बचाने में 3 बड़ी अड़चनें हैं:</p>
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<li style="text-align: justify;"><strong>राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी:</strong> पर्यावरण कार्यकर्ता मंशी असर का कहना है कि समस्या तकनीक या नियमों की कमी नहीं है, बल्कि राजनीतिक चुनाव है कि संरक्षण तंत्र को नजरअंदाज किया जाए.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>पुनर्वास में मुश्किलें:</strong> नेपाल के 2015 <a title="भूकंप" href="https://www.abplive.com/topic/earthquake" data-type="interlinkingkeywords">भूकंप</a> के बाद पता चलता है कि लोग नए स्थानों पर बसने के बजाय अपने पुराने गांवों और खेतों के बीच आना-जाना करते रहते हैं. इसे सर्कुलर रीसेटलमेंट कहा जाता है. जोशीमठ में भी कई लोग पुनर्वास स्थलों से सहमत नहीं हैं.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>वहन क्षमता का कैलकुलेशन:</strong> सुप्रीम कोर्ट की समिति ने सुझाव दिया है कि पर्यटन स्थलों की वहन क्षमता का आकलन किया जाए, लेकिन यह भी चेतावनी दी गई है कि यह ऊपर से थोपे गए प्रतिबंध न बन जाएं, बल्कि स्थानीय लोगों की भागीदारी से तय हों.</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;"><strong>तो क्या सभी शहरों को नहीं बचाया जा सकता?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">इस पूरी बहस का सार यह है कि हिमालय के सभी शहरों को उसी रूप में बचाया नहीं जा सकता. कुछ जगहों पर भूगोल ही ऐसा है कि बार-बार पुनर्निर्माण के बाद भी जोखिम बना रहता है. इसका मतलब यह नहीं कि सब कुछ खत्म हो गया है. कई शहरों का भविष्य होगा, लेकिन उनका भविष्य हर चीज को वैसे ही दोबारा बनाने पर निर्भर नहीं हो सकता.</p>
<p style="text-align: justify;">असली काम यह तय करना है कि क्या सुरक्षित बनाया जा सकता है, क्या बहाल किया जा सकता है और क्या बदलना ही होगा. जोशीमठ में भू-धंसाव रोकने के लिए ढलान स्थिरीकरण और जल निकासी पर काम शुरू हो चुका है.</p>
<p style="text-align: justify;">सुप्रीम कोर्ट की समिति पर्यटन स्थलों की वहन क्षमता तय करने पर जोर दे रही है. जब तक राजनीतिक इच्छाशक्ति, स्थानीय भागीदारी और वैज्ञानिक आकलन एक साथ नहीं आते, तब तक हिमालयी शहरों की कहानी 'बचाव' से ज्यादा 'इंतजार' की बनी रहेगी.</p>
Source Credit: abplive.com
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